चाहतों का क्या!
चाहतों का क्या है! चाहतें तो पागल होती हैं। जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ किनंगे धूसर पहाड़ों कोबसंत के हरेपन से ढँक दूँ, नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी सेलबालब भर दूँ, घाटी के सूख चुके सोतों कोफिर से जीवित...
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-- नाज़िम हिकमत . इस तरह से मैं खड़ा हूँ बढ़ती रोशनी में मेरे हाथ भूखे, दुनिया सुंदर मेरी आँखें समेट नहीं पातीं पर्याप्त पेड़ों को -वे इतने उम्मीद भरे हैं, इतने हरे। एक धूप भरी राह गुज़रती है शहतूतों से...
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बेशक फासिस्ट जब इस देश के संविधान को भी व्यवहारतः ताक पर रखकर हमारे अतिसीमित, रहे-सहे जनवादी अधिकारों पर भी डाका डाल रहे हैं तो हम उन अधिकारों के लिए लड़ेंगे और फासिस्टों को बेनक़ाब करने के लिए संविधान...
View Articleफ़ासिस्ट अंधेरगर्दी और आतंक राज के ख़िलाफ़ साहस के साथ आवाज़ उठाना आज हमारा...
मेरा तो जनता के पक्ष में खड़ा होने वाले सभी कवियों, लेखकों, कलाकारों से साफ़-साफ़, दो टूक शब्दों में कहना है कि सभी सरकारी अकादमियों, जयपुर लिटफेस्ट, साहित्य आजतक जैसे आयोजनों, विविध साहित्य महोत्सवों...
View Articleदुःख के बारे में एक और खोज
दुःख अंत की भाषा था ।और भाषा का अंत था ।अँधेरे का व्याकरण था दुःख और व्याकरण का अन्धेरा ।दुःख था अकेलेपन की चीख और एक चीख का अकेलापन ।दुःख अन्दर की खोहों की निरुद्देश्य खोजपूर्ण यात्रा था ।दुःख अकेले...
View Articleकूपमंडूकता के बारे में कुछ नोट्स
कूपमंडूकों द्वारा अमरत्व का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की अपेक्षा क्षणभंगुर जीवन लाखगुना बेहतर होता है I*तो चलिए कूपमंडूकता के बारे में कुछ और गप्प-गलचौर किया जाये, इस बात की परवाह किये बिना कि ये बातें...
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मैं सोच रही हूँ कि तीन दिन तक दिन-रात पन्द्रह सौ कविताएँ लिखूँ, फिर उसकी पन्द्रह प्रतियाँ ख़ुद ही छाप लूँ, इस घोषणा के साथ कि यह पन्द्रह सौ वर्षों की श्रेष्ठतम काव्यकृति है। उसकी क़ीमत पन्द्रह करोड़...
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आज तथाकथित साहित्यिक अवांगार्द की चर्चा बहुत होती है, और इस शब्द का अभिप्राय मुख्यत: रूप के क्षेत्र में होने वाले फैशनेबुल प्रयोगों से ही होता है। मेरे विचार में सच्चे अवांगार्द, सच्चे हरावल वे...
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उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दोख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दोगरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं सेकुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दोसुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़मानाजो नक़्श-ए-कुहन तुम...
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मेरी कविता 'एक मध्यवर्गीय विद्रूप काव्यात्मक विडम्बना'का नेपाली भाषा में अनुवाद किया है नेपाली कवि कामरेड Bala Ram Timalsina ने। पाठकों की सुविधा के लिए नीचे मूल कविता भी दे दी गयी है। एउटा...
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ज़्यादातर लोगों द्वारा सुनाये गये किस्से सजे-धजे बागों की तरह लगते हैं -- करीने से छाँटी गयी बाड़, सुव्यवस्थित फूलों की क्यारियाँ, सलीके से कटी घास का मैदान और कुछ सुन्दर सजावटी झाड़ियाँ और पेड़। कुछ...
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''किसी कमरे में जहांँ सभी लोग सर्वसम्मति से चुप रहने का षड्यंत्र किये बैठे हों ,सत्य एक पिस्तौल दगने जैसी आवाज़ करता है ''-- पोलिश कवि चेस्वाव मिवोश
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... बौद्धिक समाज में, या आम मध्यवर्गीय नागरिकों के बीच रहते हुए अगर आप उसूलपरस्त हैं तो दोस्त गिने-चुने मिलेंगे और दुश्मन बहुतायत में। ... अगर आप संवेदनशील और सोचने वाले इंसान हैं तो दुख हमेशा आपका...
View Articleपराजय के दिनों में सर्वहारा राजनीति का क़सीदा
तुम नहीं गाती होखोयी हुई चीज़ों का शोकगीत।बस उन्हें स्मृतियों में सुरक्षित रखती हो। जो निर्माण किया जाना है भविष्य मेंतुम उसकी कविता सुनाती होकभी एक सहज बयानतो कभी एक फंतासी की शैली में। तुम पूर्वजों...
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आज से लगभग 50 साल पहले 'भंगिमा'में छपी शशि प्रकाशकी एक लम्बी कविता – ‘यात्रा में : सुदर्शन भाई से कविता सम्वाद’ का एक अंशआत्मपीड़ा का दाह, दृष्टि का सुकून और कविता का उपसंहार फिर भी सुदर्शन भाई,यह...
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कहना ज़रूरी है... "प्यार को केवल स्वस्थ यौनिक सहज-वृत्ति की तृप्ति के रूप में ही नहीं समझा जाना चाहिए । इस अहसास को, जो हमें अत्यधिक आनन्द देता है, विचारधारात्मक अंतरंगता से, एक साझे लक्ष्य की...
View Articleएक सुबह ऐसी ...
कहीं सूखे काठ पर चल रही है आरी। सड़क पार झोपड़ी के सामने बैठी एक औरतमोढ़े की बुनाई कर रही है। हरे पत्तों के झुरमुट में ठुनक रही है गिलहरी। प्रेमातुर बुलबुल चीख रही है। चिलकती धूप में भटकते हुए...
View Articleमैं ग़ज़्ज़ा हूँ
मैं ग़ज़्ज़ा हूँमैं ग़ज़्ज़ा हूँआउश्वित्ज़ और तमाम गैस चैम्बरों काएक जीवित स्मृति स्तंभ। मेरे भीतर साँस लेते हैंभस्मीभूत हिरोशिमा और नागासाकी। मैं वियतनाम में कार्पेट बॉम्बिंग कीजीती-जागती मिसाल हूँ।...
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धरती के उस टुकड़े परजहाँ तितलियाँ भी बच्चों सेलम्बी ज़िन्दगी जीती हैं, मैं तुम्हारे लिए कैसी कविता लिखूँ? -- अहमद आरिफ़#ग़ज़्ज़ा
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